बिहार के बोचहां विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव को लेकर चुनाव प्रचार ज़ोरों पर है। इस उपचुनाव को लेकर NDA के सबसे बड़े दल भाजपा और बिहार के एक छोटे सहयोगी दल विकासशील इंसान पार्टी के बीच बड़ा विवाद हुआ। विकासशील इंसान पार्टी के सभी तीन विधायक अब भाजपा में शामिल हो गए हैं और विकासशील इंसान पार्टी NDA से लगभग बाहर हो गई है।

हालांकि पार्टी के नेता मुकेश सहनी अभी भी नीतीश सरकार में मंत्री हैं लेकिन ये भी कुछ ही दिनों की बात लगती है। बिहार में इस उपचुनाव के साथ और भी राजनीतिक गतिविधियाँ हो रही हैं। वरिष्ठ समाजवादी नेता शरद यादव ने अपनी पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल का विलय लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल में कर दिया।

शरद यादव के इस क़दम के बाद ख़बर आयी कि लालू यादव के पुराने साथी देवेंद्र यादव भी अपने साथियों के साथ राष्ट्रीय जनता दल का हिस्सा बन गए हैं। शरद यादव और देवेंद्र यादव ने शुरुआत तो लालू यादव के साथ की लेकिन बिहार के राजनीतिक समीकरण बदले तो ये दोनों नेता लालू यादव के ख़िलाफ़ और नीतीश कुमार के साथ खड़े हो गए।

एक समय था जब जदयू का सबसे बड़ा नेता शरद यादव को माना जाता था लेकिन धीरे धीरे वो पार्टी में हाशिए पर चले गए। इसके बाद शरद यादव ने नया दल बनाया। कुछ यही कहानी देवेंद्र यादव की भी रही, लंबे समय तक जदयू में रहने के बाद देवेंद्र यादव ने भी नीतीश कुमार की पार्टी को छोड़ दिया।

जानकार मानते हैं कि पुराने समाजवादी नेताओं के मन में ये बदलाव तेजस्वी यादव की वजह से हुआ है। 2020 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव के बिना राजद ने चुनाव लड़ा। इस चुनाव में तेजस्वी यादव ही पार्टी के नेता थे, तेजस्वी के नेतृत्व में राजद राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, इतना ही नहीं तेजस्वी वैचारिक तौर पर भी पक्के नज़र आने लगे।

नीतीश कुमार और भाजपा का विरोध करने वाले समाजवादी नेताओं को तेजस्वी में एक नेता नज़र आने लगा। राजद में इस तरह बड़े नेताओं का आना भाजपा और जदयू दोनों के लिए चिंता पैदा कर रहा है। बिहार सरकार के गिरने की ख़बरें मीडिया में बहुत पहले से आती रही हैं लेकिन इन ख़बरों में कभी कोई दम नहीं रहा। एक बार फिर कुछ ऐसी ख़बरें मीडिया में चल पड़ी हैं कि राजद और कांग्रेस मिलकर कुछ बड़ा कर सकते हैं।

असल में बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं, इनमें से सत्ताधारी NDA के पास 127 सीटें ही हैं।बहुमत के लिए 122 सीटें होना ज़रूरी है। असल में NDA की सरकार के दो बड़े दल भाजपा और जदयू के पास मिलाकर 122 सीटें हो गई हैं वहीं 4 विधायक हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और एक निर्दलीय भी NDA के साथ है।

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा आए दिन NDA सरकार के ख़िलाफ़ ही बयान देती रहती है, ऐसे में इस दल पर बहुत भरोसा करना NDA नेताओं के लिए समझदारी न होगी। विपक्ष की बात करें तो महागठबंधन की राजद के पास 75, सीपीआई माले के पास 12, सीपीआई के पास 2 और सीपीआई-एम के पास 2 सीटें हैं, ये आँकड़ा मिलकर 91 हो जाता है वहीं कांग्रेस भी मिल जाए तो उसकी 19 सीटें मिलकर आँकड़ा 110 पहुँच जाता है।

महागठबंधन अगर सरकार बनाने की कोशिश करेगी तो AIMIM की पाँच सीटों का समर्थन भी उसके पाले में आ सकता है। ऐसे में आँकड़ा 115 हो जाता है। अगर इस 115 में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के 4 विधायक जुड़ जाते हैं तो ये 119 सीटों पर पहुँच जाएगा वहीं बोचहां से अगर राजद जीत जाती है तो ये संख्या 120 पहुँच जाएगी। कहने का अर्थ है कि बिहार के राजनीतिक समीकरण अब एक-एक विधायक को एकजुट करने पर निर्भर दिख रहे हैं। ऐसे में देवेंद्र यादव और शरद यादव का राजद के साथ आना भाजपा और जदयू के लिए बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है।