लखनऊ: उत्तर प्रदेश में इस बार 100 सीटें जीतने के दावे करने वाली कांग्रेस को सिर्फ़ दो सीटें मिली हैं. अधिकतर सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार 3-4% वोट भी नहीं पा सके हैं. दो सीटें तो कांग्रेस जीती है वहीं कुछ इक्का दुक्का और सीटों पर उसको कुछ वोट मिले हैं, इसके अतिरिक्त कांग्रेस अपनी ज़मानत भी नहीं बचा सकी है.

उत्तर प्रदेश की सत्ता पर एक समय राज करने वाली कांग्रेस पार्टी महज़ 2 सीटों पर सिमट गई है। कांग्रेस का मत प्रतिशत महज़ 2.33% है। कांग्रेस को कुल 2151234 वोट मिले हैं, दो सीटें जो कांग्रेस जीती है उनमें एक रामपुर ख़ास है जहाँ से सपा ने कांग्रेस का समर्थन किया था वहीं दूसरी सीट फरेन्दा है।

इन दो सीटों का वोट मिला हटा दें तो कांग्रेस का मत प्रतिशत और भी नीचे चला जाएगा। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू भी चुनाव लड़े थे और तीसरे स्थान पर थे। जानकार मानते हैं कि कांग्रेस का वोट इतना कम हो जाना ही भाजपा के लिए संजीवनी साबित हुआ. कांग्रेस समर्थक मानते थे कि उनकी पार्टी 8-10% वोट हासिल करेगी. ख़ुद प्रियंका गांधी ने गाँव-गाँव जाकर प्रचार किया लेकिन संगठन का बुरी तरह कमज़ोर होना पार्टी को ले डूबा.

मौजूदा कांग्रेस में जो नेता हैं उनमें अधिकतर मलाई खाने वाले लोग हैं, संघर्ष करने वाले लोग बहुत कम हैं. इसके अलावा अब जबकि इतनी बुरी हार पार्टी की हुई है तो हर नेता दूसरे नेता को दोष देता दिख रहा है.

विश्लेषक मानते हैं कि बसपा का जानबूझकर हल्का चुनाव लड़ना भाजपा को फ़ायदा दे गया वहीं कांग्रेस का अपना वोट पूरी तरह से खो देना भी भाजपा के लिए फ़ायदा साबित हुआ. अगर देखा जाए तो समाजवादी पार्टी ने 32%, रालोद को 2.85% और सुभासपा को भी 2% के क़रीब वोट मिलना साबित करता है कि सपा गठबंधन ने अच्छा चुनाव लड़ा. सपा गठबंधन को क़रीब 37% वोट मिल गया लेकिन भाजपा को बसपा का और कांग्रेस का वोट जाना जीत दिला गया.

जहां बसपा को लेकर तो सभी मीडिया प्रोग्राम चर्चा कर रहे हैं वहीं कांग्रेस के ख़ात्मे को भी चर्चाओं में लाया जा रहा है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का 2% के क़रीब वोट पाना उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर सवाल खड़े करता है.

बसपा का भी बुरा हाल…
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव ख़त्म हो चुके हैं और एक बार फिर भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनने जा रही है. इस चुनाव में जहाँ भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया वहीं सपा ने भी अपने वोट प्रतिशत और सीटों में भारी बढ़त हासिल की. जहाँ सपा और भाजपा के बीच ही पूरा चुनाव रहा वहीं बसपा उत्तर प्रदेश में लगभग ख़ात्मे की तरफ़ बढ़ गई.

उत्तर प्रदेश की सत्ता पर तीन बार राज करने वाली बसपा को इस चुनाव में महज़ एक सीट मिली है. 403 सीटों वाली विधानसभा में एक सीट जीतना अपने आप में बसपा की राजनीतिक स्थिति का बयान है. बसपा को सीटों के हिसाब से देखें तो महज़ 0.24% सीट मिली हैं वहीं कुल वोट का हिसाब करें तो बसपा को 12.9% वोट मिला है. वोट प्रतिशत में बसपा तीसरे नम्बर की पार्टी ज़रूर है लेकिन ये भाजपा और सपा से बहुत फ़ासले पर है.

कुछ जानकार मानते हैं कि यहाँ से बसपा की वापसी बिना किसी करिश्मे के नामुमकिन है. वोटों की गिनती से एक दिन पहले बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी का उपाध्यक्ष घोषित कर दिया था वहीं अपने भतीजे आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर बना दिया था. पिछले कुछ समय से मायावती सतीश चन्द्र मिश्रा के ऊपर निर्भर हैं, ये फ़ैसले हालाँकि चुनाव बाद आए हैं लेकिन इनसे ज़ाहिर है कि बसपा प्रमुख पार्टी पर अपनी कमज़ोर होती पकड़ को फिर से मज़बूत करना चाहती हैं.

कहाँ से जीती बसपा?
उत्तर प्रदेश में बस एक ही सीट पर बसपा चुनाव जीती है. ये सीट है रसारा की. रसारा से बसपा के रमाशंकर सिंह चुनाव जीते हैं. उन्हें 87887 वोट मिले जबकि दूसरे नम्बर पर रहे सुभासपा प्रत्याशी 81304 वोट मिले. यहाँ भाजपा तीसरे नम्बर पर रही, उसे 24235 वोट मिले.

उत्तराखंड और पंजाब में बसपा को मिली सीटें..
उत्तराखंड में बसपा को 2 सीटें मिली हैं जबकि पंजाब में भी बसपा को एक सीट मिली है. इसका अर्थ ये हुआ कि जहां बसपा उत्तर प्रदेश में अपना 10% वोट खो बैठी यहाँ उसको कोई ख़ास नुक़सान नहीं हुआ है. यहाँ उसके प्रत्याशियों ने अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन किया ही.

क्या बसपा ने की भाजपा की मदद-
कई विश्लेषक कह रहे हैं कि बसपा ने अपना कोर वोट भाजपा में शिफ्ट करवाकर भाजपा की मदद की. इसके पीछे कई तर्क भी हैं जिनमें एक तर्क है कि गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव के दौरान ही बसपा सुप्रीमो की तारीफ़ कर दी और मायावती ने भी इसको अच्छे से स्वीकार कर लिया. पूरा चुनाव चलता रहा लेकिन मायावती ने बस गिनती की ही सभाएं कीं और अपने वोटर को एहसास दिलाया कि बसपा मुक़ाबले से बाहर है. सपा और दूसरे दलों ने बसपा पर भाजपा से मिलीभगत का आरोप भी लगाया.

बसपा ने इन आरोपों पर गोल मोल जवाब ही देती रही. बसपा अब कह रही है कि उसका निशाना 2024 लोकसभा चुनाव है. ऐसे में वो इसी ओर फोकस करेगी.