1989 में पहली बार बसपा ने खोला था खाता, 1 सीट वाली पार्टी को अब मायावती कैसे बढ़ाएंगी…?

बहुजन समाज पार्टी यूँ तो एक राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन इस पार्टी ने जो कामयाबी उत्तर प्रदेश में हासिल की, वो किसी और राज्य में हासिल नहीं की। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद बहुजन समाज पार्टी एक मुश्किल दौर में पहुँच गई है। इस चुनाव में पार्टी को राज्य की 403 में से महज़ एक सीट हासिल हुई। हम जानने की कोशिश करते हैं इस पार्टी के उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास की…

37 साल पहले 14 अप्रैल, 1984 को कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। कांशीराम की बनाई इस पार्टी को दलित समुदाय के हक़ों की बात करने वाली पार्टी माना गया था.

कांशीराम ने पार्टी को स्थापित करने के लिए बड़ा आंदोलन चलाया।बसपा ने सन 1989 के विधानसभा चुनाव में 372 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए।

तब उत्तराखंड नहीं बना था और राज्य में कुल सीटें 425 थीं, इस चुनाव में बसपा को 13 सीटें मिलीं और 9.41% वोट मिला। 1989 के चुनाव के बाद बसपा राज्य की चौथी सबसे बड़ी पार्टी बन गई।

1991 के विधानसभा चुनाव तक उत्तर प्रदेश में राजनीति ने साम्प्रदायिक रँग ले लिया था। भाजपा ने पहली बार राज्य में सरकार बनाई, उसे 221 सीटें मिलीं।

दलितों के हक़ के लिए लड़ने वाली बसपा को इस चुनाव में पिछली बार से एक सीट कम 12 सीटें मिलीं। 1993 विधानसभा चुनाव तक भाजपा काफ़ी मज़बूत हो गई थी। भाजपा को हराने के लिए 1992 में वजूद में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन कर लिया।

सपा ने 256 और बसपा ने 164 सीटों पर चुनाव लड़ा। इस चुनाव में बसपा ने 67 सीटें जीतीं जबकि सपा ने 109 सीटें जीतीं।भाजपा ने यूँ तो 177 सीटें जीतीं लेकिन सपा और बसपा गठबंधन से वो पीछे रह गई.

राज्य की सत्ता में पहली बार बसपा भी हिस्सेदार बनी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।सपा और बसपा में राजनीतिक मतभेद उभरे और 1995 में मुलायम सिंह यादव की सरकार से बसपा ने समर्थन वापिस ले लिया।

इसके बाद भाजपा से समर्थन लेकर बसपा के नेतृत्व में सरकार बनी और 3 जून 1995 को बसपा नेता मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं।

कुछ ही दिन में बसपा और भाजपा में टकराव शुरू हुआ और मायावती की सरकार गिर गई। 1996 में एक बार फिर राज्य में विधानसभा चुनाव हुए। 1993 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 296 सीटों पर चुनाव लड़ा।

बसपा ने 67 सीटों पर जीत हासिल की, उसे 19.6% वोट मिला। इस चुनाव में बसपा तीसरे नम्बर की पार्टी रही.मायावती 1997 में भी कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बनीं। 2001 में बसपा अध्यक्ष कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

2002 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन किया और उसे 98 सीटों पर जीत हासिल हुई। इस चुनाव में सपा को 143 और भाजपा को 88 सीटें मिलीं।

चुनाव के बाद भाजपा ने बसपा को समर्थन दे दिया और 3 मई 2002 को मायावती एक बार फिर राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। 15 महीने से कुछ कम दिन मुख्यमंत्री रहने के बाद भाजपा ने बसपा से समर्थन वापिस ले लिया।

इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस और अन्य दलों के विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई।सन 2006 में कांशीराम की मौत हो गई, बहनजी के नाम से जानी जाने वाली मायावती ने अंतिम दिनों में कांशीराम की बहुत सेवा की।

2007 में एक बार फिर विधानसभा चुनाव हुए।2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा को समाजवादी पार्टी के ख़िलाफ़ चली सत्ता विरोधी लहर का फ़ायदा मिला और बसपा ने 403 में से 206 सीटों पर शानदार जीत हासिल की।

सपा इस चुनाव में महज़ 97 सीटों पर सिमट गई वहीं भाजपा को सिर्फ़ 51 सीटें मिलीं। 2007 के चुनाव में बसपा को 30.43% वोट मिला। 13 मई 2007 को मायावती ने आख़िरी बार राज्य के मुख्यमंत्री की शपथ ली।

2012 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर सत्ता विरोधी लहर थी। बसपा ने 403 सीटों पर अकेले दम पर चुनाव लड़ा और महज़ 80 सीटों पर जीत हासिल की वहीं समाजवादी पार्टी ने 224 सीटों के बहुमत के साथ विजय हासिल की।

सपा के तत्कालीन अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश यादव का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए आगे किया, अखिलेश राज्य के मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का वोट घटकर 25.91% रह गया।

2017 के विधानसभा चुनाव बसपा के लिए बड़ा झटका थे। इस चुनाव में भाजपा ने 312 सीटें हासिल कीं तो बसपा को सिर्फ़ 19 सीटें मिलीं। बसपा का वोट प्रतिशत थोड़ा और घटा और 22.23% रह गया।

इस चुनाव के बाद भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। 2022 के हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा का ग्राफ़ बहुत नीचे आ गया। पार्टी पहली बार दहाई का आँकड़ा नहीं छू सकी।

बसपा 403 सीटों ओर चुनाव लड़ा और उसे सिर्फ़ एक सीट पर जीत मिली। बसपा का वोट शेयर घटकर 12.88% रह गया। इस चुनाव में भाजपा को 376 सीटों पर लड़कर 41.29% वोट मिला जबकि सपा को 347 सीटों पर लड़कर 32.06% वोट हासिल हुए।

2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा के 403 में से 290 प्रत्याशी ज़मानत तक बचाने में नाकाम रहे। जानकार मानते हैं कि 2022 में बसपा का प्रदर्शन इसके अस्तित्व पर सवाल खड़े करता है और अगर पार्टी को फिर से प्रदेश और देश में नाम कमाना है तो कुछ ठोस क़दम उठाने ज़रूरी हैं।

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