पिछले कुछ सालों से कांग्रेस पार्टी अधिकतर चुनाव तो हार ही रही है लेकिन इसकी एक समस्या ये है कि अंदरूनी मतभेद भी पार्टी में उभर कर आ रहे हैं. असल में कांग्रेस के हर राज्य में मुख्यमंत्री के कई उम्मीदवार हैं. पार्टी जीत रही है या हार रही है ये अलग बात है लेकिन लगभग हर राज्य में पार्टी के पास नेताओं की बड़ी संख्या है जो कार्यकर्ताओं वाले काम नहीं करना चाहते.

उत्तर प्रदेश में भले पार्टी का झंडा उठाने वाले कार्यकर्ता नहीं हैं लेकिन यहाँ भी कांग्रेस के नेता कोई काम करना नहीं चाहते. आराम तलबी में लगे ये कांग्रेसी नेता बस तभी परेशान होते हैं जब कांग्रेस में कोई ऐसा व्यक्ति आ जाता है जो काम करना चाहता है. यही वजह है कि पार्टी के अन्दर ऐसा माहौल बन गया है कि चुनाव को लेकर रणनीति जो भी बने उस पर ठीक से काम नहीं हो पाता.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की अंदरूनी कलह ने ही पार्टी की सरकार गिरा दी. ज्योतिरादित्य सिंधिया ख़ुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे और जब उन्हें लगा कि ऐसा नहीं होने वाला तो वो भाजपा में जाकर केन्द्रीय मंत्री बन गए. ऐसा नहीं कि इससे कमलनाथ ख़ेमे को कोई दुःख हुआ. कमलनाथ ख़ेमे ने तो इसको लम्बे समय के लिए अच्छा संकेत माना कि अब पार्टी में उनका मामला और मज़बूत हो जाएगा.

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचित पायलट के बीच प्रतिद्वंदिता बनी ही हुई है. सचिन ख़ुद मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, वो एक बार बग़ावत की कोशिश कर भी चुके हैं लेकिन गहलोत ने उनको कामयाब नहीं होने दिया. पंजाब में अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू का विवाद इस स्तर तक बढ़ा कि चरणजीत सिंह चन्नी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनाया.

चुनाव के ठीक पहले लिए गए इस फ़ैसले से भी पंजाब कांग्रेस के कई नेता नाराज़ दिखे. सिद्धू के अलावा सुनील जाखड़ भी पंजाब में कांग्रेस के लिए मुसीबत बने और पार्टी जीता हुआ चुनाव बुरी तरह से हार गई. गुजरात में आजकल हार्दिक पटेल नाराज़ चल रहे हैं और अब ख़बर हरियाणा से है. हरियाणा में कांग्रेस ने लम्बे सोच विचार के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा के क़रीबी उदय भान को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष घोषित किया था.

इस फ़ैसले के कुछ ही घंटों बाद पार्टी के कद्दावर नेता कुलदीप सिंह विश्नोई ने पार्टी के फैसले के खिलाफ़ ठीक वैसे ही मोर्चा खोल दिया है जैसे तक़रीबन पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू ने किया था. कुलदीप विश्नोई ने ट्विटर पर लिखा कि आप लोगों की तरह मैं भी गुस्से में हूँ लेकिन जब तक मैं राहुल गांधी से जवाब नहीं मांग लेता तब तक हमें कोई कदम नहीं उठाना चाहिए.

वो लिखते हैं-“साथियों, आप सबके संदेश सोशल मीडिया पर पढ़ रहा हूँ। आपका अपार प्यार देख कर मैं अत्यंत भावुक हूँ। आपकी तरह ग़ुस्सा मुझे भी बहुत है।लेकिन मेरी सब से प्रार्थना है कि जब तक मैं राहुल जी से जवाब ना माँग लूँ, हमें कोई कदम नहीं उठाना है।अगर मेरे प्रति आपके मन में स्नेह है तो संयम रखें।”

इसका कारण क्या है कि कांग्रेस कोई भी फ़ैसला ले उसका अन्दर ही अन्दर विरोध शुरू हो जाता है. अगर हरियाणा के केस में ही समझें तो अगर कुलदीप बिश्नोई की बात कांग्रेस नेतृत्व कर ले तो हुड्डा कैम्प नाराज़ हो जाएगा. असल में कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी हैं लेकिन माना जाता है कि संगठन के फ़ैसले राहुल गांधी लेते हैं.

नेतृत्व को लेकर क्लैरिटी न होने की वजह से फ़ैसलों पर विवेचना ठीक से नहीं हो पाती. राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों के काम करने की शैली भी अलग है और दोनों की टीमें भी अलग हैं. ऐसे में कांग्रेस के हर फ़ैसले पर वो गुट नाराज़ दिखता है जिसके मन की नहीं चलती है. अगर पार्टी अपने इन विवादों को ठीक से हैंडल नहीं करती है तो उसको इसकी लगातार क़ीमत चुकानी पड़ती रहेगी.