उत्तर प्रदेश की बदायूँ विधानसभा सीट बदायूँ ज़िले में पड़ती है. बदायूँ शहर के इतिहास की बात करें तो ये बहुत पुराना शहर है और यहाँ इल्तुतमिश की बनाई जामा मस्जिद भी है. पुरानी इमारतों से सजे इस शहर को तहज़ीब का मरकज़ कहा जाता है. चुनावी गणित की बात करें तो यहाँ सपा और भाजपा के बीच मुक़ाबला माना जाता रहा है.

ज़िले के शहरी क्षेत्र में पड़ने वाली इस सीट पर कभी कांग्रेस का क़ब्ज़ा हुआ करता था लेकिन 1985 के बाद से यहाँ कांग्रेस कभी भी कोई चुनाव नहीं जीत सकी. 1985 में यहाँ से कांग्रेस की प्रेमिला बढ़वार मिश्रा चुनाव जीती थीं, ये आख़िरी बार था जब कांग्रेस इस सीट पर जीती. ‘राम मंदिर’ आन्दोलन और साम्प्रदायिक राजनीति के ज़ोर पकड़ने के बाद भाजपा ने यहाँ अपनी मज़बूत पकड़ बना ली. 1989 में भाजपा के कृष्ण स्वरुप ने यहाँ से चुनाव जीता और 1991 में एक बार फिर वो विधायक चुने गए.

1993 में सपा ने कृष्ण स्वरुप के सामने जोगिन्दर सिंह को उतार दिया. जोगिन्दर ने ये चुनाव जीत लिया. 1996 में भाजपा ने प्रेम स्वरुप पाठक को चुनावी मैदान में उतारा और जोगिन्दर सिंह की शिकस्त हुई. 2002 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने व्यापारी विमल कृष्ण अग्रवाल उर्फ़ पप्पी को टिकट दिया. चौंकाने वाले नतीजों में पप्पी ने जीत हासिल की और दूसरे नम्बर पर सपा के जोगिन्दर सिंह रहे.

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्षा मायावती से नाराज़ होकर पप्पी ने पार्टी छोड़ दी और सपा का दामन थाम लिया. 2007 का चुनाव यूँ तो बसपा की लहर का माना जाता है लेकिन यहाँ वो तीसरे पर ही रही, 2017 में भाजपा के महेश चन्द्र ने जीत हासिल की और सपा से चुनावी मैदान में उतरे पप्पी हार गए.

2012 में समीकरण एक बार फिर बदले. सपा ने नई रणनीति के तहत आबिद रज़ा ख़ान को टिकट दिया. ऐसा माना जा रहा था कि आबिद रज़ा ख़ान एक कमज़ोर प्रत्याशी हैं लेकिन चुनाव जैसे जैसे आगे बढ़ा वो जीत की ओर बढ़ने लगे. भाजपा के महेश चन्द्र गुप्ता और बसपा के राम सेवक सिंह से हुए त्रिकोणीय मुक़ाबले में आबिद ने जीत दर्ज की.

सन 2017 आते-आते आबिद रज़ा ख़ान का विरोध सपा के अन्दर बढ़ रहा था. इस विरोध के बावजूद सपा ने आबिद रज़ा ख़ान को टिकट दिया. भाजपा के महेश चन्द्र गुप्ता ये चुनाव जीत गए. 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक बार फिर महेश चन्द्र गुप्ता को टिकट दिया है जबकि सपा ने रईस अहमद को टिकट दिया है. असल में सपा से बाहर चल रहे आबिद रज़ा पार्टी से टिकट की आस लगाए बैठे थे.

परन्तु आबिद को आज़म ख़ान का क़रीबी माना जाता है और ऐसा कहा जाता है कि आज़म की सिफ़ारिश सपा में बड़ी पहुँच रखती है. जेल में बंद आज़म ने आबिद की सिफ़ारिश भी की थी और लग रहा था कि उन्हें टिकट मिल जाएगा. आख़िरी समय में लेकिन बदायूँ के पूर्व सांसद और मुलायम सिंह यादव परिवार के अहम् सदस्य धर्मेन्द्र यादव ने आबिद के नाम का खुलकर विरोध किया.

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 2019 के लोकसभा चुनाव में आबिद रज़ा ने सपा के प्रत्याशी धर्मेन्द्र यादव का खुलकर विरोध किया था. धर्मेन्द्र की इस चुनाव में क़रीबी अंतर से हार हो गई थी. धर्मेन्द्र सपा नेतृत्व के आगे अड़ गए जिसके बाद आबिद रज़ा का टिकट काटा गया और उनकी जगह रईस अहमद को टिकट दिया गया. इस सीट से बहुजन समाज पार्टी ने ठाकुर राजेश कुमार सिंह को टिकट दिया है जबकि कांग्रेस ने यहाँ से रानी सिंह को प्रत्याशी बनाया है.