सन 2011 में पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट फ्रंट की सरकार थी, इस फ्रंट की सबसे बड़ी पार्टी सीपीआई (एम) थी और ऐसा माना जाता था कि बंगाल में वामपंथी राजनीति का क़िला ढहाना लगभग नामुमकिन है. सन 1977 से लगातार लेफ़्ट फ्रंट पश्चिम बंगाल में सरकार बना रहा था. मार्क्सवादी विचारधारा पर चलने वाले लेफ्ट फ्रंट ने लगातार चुनावों में लगभग एकतरफ़ा जीत दर्ज की.

दूसरी ओर लम्बे समय से संघर्ष कर रहीं ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को आगे बढ़ा रही थीं. सन 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने लेफ़्ट फ्रंट को हरा दिया. 2011 में लेफ्ट फ्रंट को 30% से अधिक वोट मिले लेकिन 2016 में ये 20% ही रह गया और 2021 में इसको 5% वोट ही मिले.

2011, 2016 और 2021 इन तीनों चुनावों को तृणमूल कांग्रेस ने जीता लेकिन 2021 में लेफ़्ट बहुत पीछे चली गई और उसके वोटों का बड़ा चंक भाजपा के पास चला गया. सीपीआई (एम) के खाते में कोई सीट नहीं आयी और ये कुछ ही सीटों पर दूसरे नम्बर पर रह पाई. ऐसा मान लिया गया कि वामपंथी सूरज पश्चिम बंगाल में अब लम्बे समय के लिए ढल गया.

पश्चिम बंगाल में सीपीआई (एम) ने पिछले दिनों रणनीतिक बदलाव किए और नई रणनीति के साथ हाल ही में हुए बालीगंज विधानसभा उपचुनाव और आसनसोल लोकसभा उपचुनाव में क़दम रखा. आसनसोल में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर शत्रुघ्न सिन्हा जीते और दूसरे नम्बर पर भाजपा की अग्निमित्र पॉल रहीं. सिन्हा यहाँ तीन लाख तीन हज़ार तीन सौ नौ वोटों से जीते. सीपीआई (एम) ने यहाँ से पार्था मुखर्जी को टिकट दिया था.

मुखर्जी नब्बे हज़ार चार सौ बारह वोट पाने में कामयाब रहे. लोकसभा चुनाव में भी सीपीआई (एम्) प्रत्याशी को क़रीब इतने ही वोट मिले थे, यानी कि यहाँ सीपीआई (एम्) अपना वोट बचाने में कामयाब रही. सीपीआई(एम्) के लिए ख़ुशी की बात रही बालीगंज सीट. यहाँ पार्टी हार तो गई लेकिन दूसरे स्थान पर रही. तृणमूल कांग्रेस के बाबुल सुप्रियो ने यहाँ बीस हज़ार दो सौ अट्ठासी वोटों से जीत दर्ज की. दूसरे नम्बर पर सीपीआई (एम्) की सायरा हलीम शाह रहीं.

सुप्रियो को 51,199 वोट मिले जबकि हलीम शाह को 30,971 वोट मिले. प्रतिशत में बात करें तो सीपीआई (एम्) को 30 प्रतिशत से अधिक वोट मिले. वहीं तीसरे नम्बर पर रही भाजपा को यहाँ 13 प्रतिशत से कुछ कम वोट मिले. इस हार पर भी सीपीआई(एम्) ने ख़ुशी ज़ाहिर की और कहा कि पार्टी का मत प्रतिशत शानदार तरह से बढ़ा है. बालीगंज से 2021 विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज़ 8,474 वोट मिले थे जोकि कुल मतप्रतिशत का महज़ साढ़े पाँच प्रतिशत ही थे.

ज़ाहिर है कि इस बढ़त से सीपीआई(एम्) उत्साहित है. बंगाल के राजनीतिक विश्लेषक भी सीपीआई(एम्) की परफॉरमेंस को ग़ौर से देख रहे हैं. भाजपा ख़ेमे में भी इसी बात की चिंता ज़्यादा है कि बंगाल में फिर से लेफ्ट का उदय हो रहा है. इन नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस के लोग भी लेफ्ट को ज़्यादा भाव दे रहे हैं.

बालीगंज में जब नतीजे आ गए तो भाजपा को तो जैसे इग्नोर ही कर दिया गया. तृणमूल कांग्रेस के बाबुल सुप्रियो ने सीपीआई(एम्) पर निशाना साधा और अपने ट्वीट में लिखा, ‘झूठ और छल से भरे गंदे अभियान के बावजूद पश्चिम बंगाल माकपा और साइरा शाह हलीम ने कोई लिहाज़ नहीं किया. वे शर्म भूल गई हैं. लोगों की ओर से ख़ारिज किए जाने के बाद वे उसी तरह की स्तरहीन-ओछी भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं. ‘ उन्होंने अपने ट्वीट में कहा कि साइरा ने “कोई क्लास” नहीं दिखाई.

इस पर साईरा ने भी पलटवार किया और कह दिया कि उनकी पार्टी ‘क्लास लेस’ सोसाइटी की बात करती है. वो कहती हैं कि हमारी पार्टी क्लास लेस सोसाइटी की बात करती है जहाँ अमीर और ग़रीब को धन और संपत्ति के अनुसार बांटा नहीं जाता. इस तरह की बहस ट्विटर पर आम है लेकिन ख़ास बात ये है कि किस तरह से भाजपा अब पश्चिम बंगाल में इग्नोर की जाने लगी है. भाजपा के कई नेता अपनी ही पार्टी पर अलग अलग तरह की टिपण्णी कर रहे हैं. वहीं दूसरी ओर लेफ्ट नेताओं में जोश दिख रहा है और उन्हें लग रहा है कि इस हार में भी उनकी बड़ी जीत है.