दिनांक 07/04/2019 को राग विराग कला केंद्र की ओर से आयोजित समारोह में कवि सुधा उपाध्याय को उनकी रचना ‘इसलिए कहूंगी मैं’ के लिए त्रिवेणी सभागार नई दिल्ली में प्रसिद्ध लेखिका डॉ नूर जहीर द्वारा राग विराग की ओर से 14वें शीला सिद्धान्तकर स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया. कार्यक्रम का आरंभिक वक्तव्य कवि और आलोचक शिवमंगल सिद्धान्तकर ने दिया जबकि मुख्य वक्तव्य डॉ आशुतोष कुमार द्वारा दिया गया. समारोह का संचालन शीला सिद्धान्तकर स्मृति सम्मान समिति के सचिव कवि रवींद्र के. दास द्वारा किया गया.

गौरतलब है कि शीला सिद्धान्तकर स्मृति सम्मान वर्ष 2006 से प्रतिवर्ष एक युवा कवि को स्त्रियों की आवाज बुलंद करने वाली शिखर कवि शीला सिद्धान्तकर की स्मृति में दिया जाता है जिन्होंने ‘औरत सुलगती हुई’, ‘कहो कुछ अपनी बात’, ‘कविता की तीसरी किताब’ और ‘कविता की आखिरी किताब’ जैसी महत्वपूर्ण कविता पुस्तकें हिंदी साहित्य को दी हैं. कार्यक्रम के दूसरे भाग में राग विराग कला केंद्र की छात्राओं द्वारा कथक के विवध नृत्य रूपों की प्रस्तुति की गयी जिसकी कोरिओग्राफी प्रसिद्ध कथक गुरु पुनीता शर्मा द्वारा की गयी.

अपने आरंभिक वक्तव्य में शिवमंगल सिद्धान्तकर नें साहित्य की राजनीति में भूमिका को चिन्हित करते हुए कहा कि आज के समय में देश इटली के मुसोलिनी और जर्मनी के हिटलर के फासीवाद के जिस नए भारतीय संस्करण से गुजर रहा है उसको फौरी तौर पर परास्त करने के लिए संस्कृतकर्मियों को आगे आना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस नव फासीवादी साम्राज्यवादी तंत्र के खिलाफ साहित्यकारों के शब्द किसी तोप, बारूद और प्रक्षेपास्त्रों से ज्यादा ताकतवर, चिर स्थायी और गतिशील सिद्ध होंगे.

समारोह की मुख्य अतिथि और अध्यक्ष डॉ नूर जहीर ने सुधा उपाध्याय की एक कविता का हवाला देते हुए कहा कि “जड़ें फैलाना महिलाओं की फितरत है जबकि इसके विपरीत पुरुष अक्सर उसकी जड़ें उखाड़ने का काम करता है.” उन्होंने वर्तमान राजनितिक परिप्रेक्ष्य पर टिपण्णी करते हुए कहा कि मौजूदा शासनकाल में मुसलमानों, दलितों और महिलाओं पर हमलें बढ़ें हैं जिसके खिलाफ एकजुट होकर मौजूदा निजाम को परास्त करने की जरूरत है. समारोह के मुख्य वक्ता डॉ आशुतोष कुमार ने सुधा उपाध्याय की कविता पर बोलते हुए कहा कि इस पित्रसत्तात्मक व्यवस्था में महिला का कविता लिखना केवल शब्द साधना नहीं है बल्कि उसकी मुक्ति के लिए स्ट्रेटेजी है.

उन्होंने शीला सिद्धान्तकर की कविता ‘प्रतिक्रया’ और ‘कुतिया’ को पढ़कर सुनाने के बाद कहा कि शीला सिद्धान्तकर जीवन से कमतर कुछ भी नहीं चाहती थी और औरत की आजादी को बहुत महत्व देती थी. पुरस्कृत कवि सुधा उपाध्याय ने कहा कि स्त्रियों की लड़ाई पहचान की लड़ाई है और हम अपने आस पास मौजूद पुरुष वर्चस्व से जूझ रही हैं. साथ ही उन्होंने अपनी कविताओं ‘बोलती चुप्पी’, ‘रचो अपना संविधान’ और ‘चिल्लर’ का पाठ किया. समारोह के आरम्भ में ही हाल में दिवंगत कृष्णा सोबती, नामवर सिंह, विष्णु खरे, शिवशंकर मिश्र, अर्चना वर्मा और रमणिका गुप्ता के प्रति एक मिनट का मौन रखा गया.

कार्यक्रम के दूसरे भाग में राग विराग की दो दर्जन से अधिक छात्राओं ने कथक के विभिन्न रूपों पर एकल और ग्रुप डांस प्रस्तुत कर अतिथियों को मंत्रमुग्ध कर दिया जिसकी कोरिओग्राफी कथक गुरु और प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना पुनीता शर्मा द्वारा की गयी थी. सभी छात्राओं को डॉ रेखा अवस्थी और नारायण कुमार द्वारा ट्रोफी दी गयी. कर्यक्रम के अंत में राग विराग के चेयरमैन नारायण कुमार नें अतिथियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया.

समारोह में उल्लेखनीय उपस्थिति में कवी राम कुमार कृषक, कथाकार और मीडियाकर्मी प्रियदर्शन, मीडियाकर्मी नीरज सार्थक, डॉ कुसुम जोशी, डॉ ए के अरुण, डॉ विनय वर्मा, प्रो ओ के. यादव, डॉ मदन राय, एडवोकेट अरुण मांझी, थॉमस मैथ्यूज, अजय प्रकाश, नरेन्द्र, जवाहर लाल, भूपेन्द्र चौधरी, कुबेर नाथ, नित्यानन्द गायेन, रूपक कुमार, आशुतोष राय, सौरभ सिंह क्रांतिकारी, मनीष सिन्हा, समीर और विभिन्न पेशों से जुड़े हुए अन्य सम्मानित लोग शामिल रहे.

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