लोकसभा चुनाव मिलकर ल’ड़े थे सपा-बसपा, क्या फिर यही होगा क्यूँकि अब तो..

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समाप्त होने के बाद सभी दल लोकसभा चुनाव को लेकर रणनीति बनाने में जुट गए हैं. लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं जिनमें से सबसे अधिक 80 सिर्फ़ उत्तर प्रदेश से हैं. कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुज़रता है. इसका अर्थ है कि जो भी लोकसभा चुनाव में यहाँ ज़्यादा सीटें जीतता है उसकी केंद्र में सरकार बनाने की संभावना अधिक हो जाती है.

यही वजह है कि बहुमत की सरकार बनाने के बाद भी भाजपा लोकसभा चुनाव को लेकर अपने समीकरण ठीक करने में लगी है. केंद्र और राज्य की सत्ता पर क़ाबिज़ भाजपा की कोशिश है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जो स्थिति रही उससे बेहतर स्थिति लोकसभा में रहे. इसका कारण है कि भले भाजपा को बहुमत हासिल हो गया लेकिन समाजवादी पार्टी से उसका कड़ा मुक़ाबला हुआ.

सीटों में हार जीत का फ़र्क़ भले ज़्यादा दिखे लेकिन कई सीटों पर सपा भाजपा का सीधा और कड़ा मुक़ाबला हुआ है. वोट प्रतिशत के हिसाब से देखें तो भाजपा को लोकसभा चुनाव में कई सीटों का नुक़सान हो सकता है. इस बात को भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व समझ रहा है. भाजपा नेतृत्व को लगता है कि अगर सुभासपा और प्रसपा जैसी पार्टियाँ उनके पाले में आ जाएँ तो उनको बड़ा फ़ायदा होगा.

पिछले लोकसभा चुनाव में सुभासपा भाजपा के ही साथ थी लेकिन बाद भाजपा और सुभासपा में विवाद हो गया और दोनों अलग हो गए. कुछ लोगों ने तो इस बार विधानसभा चुनाव के ख़त्म होने के बाद भी ये दावा किया कि सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर भाजपा से गठबंधन कर लेंगे. वहीं शिवपाल यादव को लेकर भी कयास लग रहे हैं कि वो भाजपा नेताओं से मिल रहे हैं. हालाँकि राजभर ने भाजपा के साथ जाने से इनकार किया और शिवपाल अभी कशमकश में ही हैं.

भाजपा लोकसभा चुनाव के लिए समीकरण सेट करने में लगी है तो सपा भी इसमें उससे पीछे नहीं रहना चाहती. सपा के अन्दर तो यहाँ तक बात हो रही है कि लोकसभा प्रत्याशियों की लिस्ट अभी से जारी कर दी जाए. ऐसा होने पर प्रत्याशियों को तैयारी का मौक़ा मिलेगा. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने गठबंधन साथियों रालोद और सुभासपा नेताओं से लगातार मिल रहे हैं.

अखिलेश यादव ने पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा के साथ गठबंधन किया था. सपा, बसपा के साथ रालोद भी थी. इस गठबंधन में दो बड़ी पार्टियों के होने की वजह से इसे महागठबंधन कहा गया. महागठबंधन अपनी उम्मीदों पर पूरा नहीं उतरा और 80 में से महज़ 15 ही सीट जीत सका, इनमें से 10 बसपा और 5 सपा के खाते में गईं. महागठबंधन के फ़ेल हो जाने के बाद सपा और बसपा ने अलग होने का फ़ैसला कर लिया.

महागठबंधन से लेकिन एक बड़ी चीज़ ज़रूर हुई. जो सपा और बसपा एक दूसरे को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे वो एक मंच पर आ गए, इससे बसपा प्रमुख मायावती और सपा के पूर्व अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के बीच जो कटुता थी वो जाती रही. इस लोकसभा चुनाव से पहले ये दोनों पार्टियां एक साथ आएँगी ऐसा तो बिल्कुल नहीं लगता लेकिन ये ज़रूर है कि कोई समीकरण बनने पर दोनों एक दूसरे से हाथ मिलाने से हिचकेंगी नहीं.

अखिलेश यादव लेकिन अभी किसी अंतिम रणनीति पर नहीं पहुँचे हैं. अखिलेश के क़रीबी मानते हैं कि इस बार भले वो चुनाव हार गए लेकिन रालोद और सुभासपा के साथ गठबंधन ने उन्हें फ़ायदा दिया. सपा इस गठबंधन को जारी रखना चाहती है. सपा कार्यकर्ता तो चाहते हैं कि अखिलेश यादव अपने चाचा शिवपाल यादव को पार्टी में विशेष सम्मान दें परन्तु अखिलेश ऐसा नहीं करते दिख रहे हैं.

कुल मिलाकर अखिलेश अभी रणनीति बनाने में लगे हैं और लोकसभा चुनाव को लेकर जल्द ही कोई संगठनात्मक गतिविधि पार्टी की ओर से हो सकती है. बात अगर बुरी तरह हारी बसपा की करें तो बसपा ने अपने नेताओं को एकजुट करना शुरू कर दिया है. बसपा की कोशिश है कि उसकी खोयी साख वापिस आए. इस विधानसभा चुनाव में उसे महज़ एक सीट मिली जबकि उसका वोट भी बहुत कम हो गया.

बसपा के पुराने नेताओं को पार्टी में वापिस लाने की कोशिश हो रही है. मायावती ख़ुद चीज़ों को ठीक करने की कोशिश कर रही हैं. ख़बर ये भी है कि बसपा अपने पुराने एजेंडे पर भी जा सकती है. बसपा की कोशिश है कि उसका कोर दलित वोट फिर से पार्टी से जुड़े.

इसके अलावा कांग्रेस भी चाहती है कि उसकी पोज़ीशन राज्य में कुछ सुधरे. विधानसभा चुनाव में किसी तरह दो सीट जीतने वाली कांग्रेस को 2% से कुछ अधिक वोट मिले. कांग्रेस संगठन के स्तर पर काम करेगी तभी कुछ मुमकिन है, हालाँकि कांग्रेस में विशेष गतिविधि लखनऊ में तो नहीं दिख रही है.

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