मऊ विधानसभा सीट के इतिहास की बात करें तो यहाँ शुरुआती दौर की राजनीति कांग्रेस के वर्चस्व वाली थी, 1967 में यहाँ से भारतीय जनसंघ ने चुनाव जीता। फ़रवरी 1969 में जब चुनाव हुए तो यहाँ से भारतीय क्रांति दल के हबीबुर रहमान ने चुनाव जीता। इस चुनाव तक आते-आते यहाँ लड़ाई सिर्फ़ दो दलों के बीच नहीं बल्कि कई दलों के बीच हो गई थी।

सन 1974 के विधानसभा चुनाव में यहाँ से पाँच प्रत्याशियों को 12 हज़ार से अधिक वोट मिले और विजेता प्रत्याशी सीपीआई के अब्दुल बाक़ी को 19814 वोट मिले, दूसरे नम्बर पर भाजपा की पैरेंट पार्टी भारतीय जनसंघ के रामजी को 13746 वोट मिले, सी.पी.एम. के ख़ैरूल बशर को 13850, भारतीय क्रांति दल के महेन्दा को 12514 और निर्दलीय राज नाथ को 12377। कांग्रेस इस चुनाव में बहुत पिछड़ गई, इसके प्रत्याशी को महज़ 2018 वोट मिले।

1977 का विधानसभा चुनाव भारत में लगे आपातकाल के बाद पहला चुनाव था। पूरे देश में जनता पार्टी के पक्ष में माहौल था, इसी माहौल का असर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर पड़ा। जनता पार्टी के रामजी ने सीपीआई के अब्दुल बाक़ी को कड़े मुक़ाबले में महज़ 108 वोटों से हरा दिया। रामजी को 33798 और बाक़ी को 33690 वोट मिले।

1980 के चुनाव में एक बार फिर जनता अलग-अलग प्रत्याशियों के बीच बंटती नज़र आयी। कांग्रेस ने अपनी पकड़ वापिस मज़बूत की लेकिन चुनाव निर्दलीय ख़ैरूल जीत गए। ख़ैरूल को 19499 वोट मिले जबकि कांग्रेस के सुहेल को 17457 वोट ही मिले। सीपीआई के अब्दुल बाक़ी को 10786 वोट मिले।

1985 के चुनाव में सीपीआई के अब्दुल बाक़ी ने शानदार वापसी की और 16204 वोटों से जीत दर्ज की। उन्हें 31607 वोट मिले जबकि दूसरे नम्बर पर रहे भाजपा के रामजी को 15403 वोट ही मिले। इस चुनाव में कांग्रेस और लोकदल प्रत्याशियों को भी 10% से अधिक वोट मिला।

1989 विधानसभा चुनाव में चार उम्मीदवारों को 20 हज़ार से अधिक वोट मिले। बसपा के मुबीन ने 26729 वोट पाकर चुनाव जीता, दूसरे पर भाजपा के रामजी को 25182 वोट मिले। कांग्रेस के हबीबुर्रहमान को 23887 और सीपीआई के इम्तियाज़ को 20782 वोट मिले।

मऊ एक ऐसी विधानसभा बन चुका था जहाँ से कोई भी पार्टी चुनाव जीत सकती है। निर्दलीय प्रत्याशी भी यहाँ अच्छे वोट पा जाते थे, यही वजह है कि 1991 के चुनाव में यहाँ से 31 प्रत्याशियों ने पर्चा भरा।

सीपीआई, भाजपा, कांग्रेस, और बसपा के प्रत्याशियों ने 18 हज़ार से अधिक वोट प्राप्त किए। सीपीआई के इम्तियाज़ अहमद ने 27597 वोट पाकर जीत दर्ज की, भाजपा ने मुख़्तार अब्बास नक़वी को टिकट दिया और वो महज़ 133 वोटों से हार गए, उन्हें 27464 वोट मिले। कांग्रेस के हबीबुर्रहमान को 19027 और बसपा के मुबीन को 18409 वोट मिले।

निर्दल प्रत्याशियों की बाढ़ के बीच 1993 का चुनाव बसपा के नसीम ने जीता। उन्हें 47764 वोट मिले, भाजपा के मुख़्तार अब्बास नक़वी को 37519 वोट ही मिले। सीपीआई के इम्तियाज़ को 18349 और कांग्रेस के महेंद्र को 9173 वोट मिले। 1996 विधानसभा चुनाव आने तक मऊ में मुख़्तार अंसारी का नाम चलने लगा था। 1996 में वो बसपा के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे। उन्होंने भाजपा के विजय प्रताप सिंह को सीधे मुक़ाबले में 25973 वोटों से हरा दिया।

2002 के विधानसभा चुनाव में मुख़्तार अंसारी को किसी पार्टी ने टिकट नहीं दिया, उन्होंने निर्दलीय पर्चा भरा और चुनाव 33042 वोटों से जीत लिया। 2007 में एक बार मुख़्तार ने निर्दलीय पर्चा भरा। बसपा के विजय प्रताप को उन्होंने सीधे मुक़ाबले में 7018 वोटों से हरा दिया। ये वो चुनाव है जब पूरे प्रदेश में बसपा लहर थी।

2009 के लोकसभा चुनाव से पहले बसपा अध्यक्षा मायावती ने मुख़्तार अंसारी को अपनी पार्टी में शामिल किया और उन्हें ‘ग़रीबों का मसीहा’ और ‘रोबिन-हुड’ जैसे नाम दिए। 2009 लोकसभा चुनाव में अंसारी ने वाराणसी लोकसभा सीट से पर्चा भरा। उन्होंने जेल से चुनाव लड़ा और भाजपा के मुरली मनोहर जोशी को कड़ी टक्कर दी। जोशी ने ये चुनाव 17211 वोटों से जीत लिया.

2012 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख़्तार अंसारी ने ‘क़ौमी एकता दल’ नामक पार्टी बना ली। इसके पहले उन्होंने ‘हिन्दू मुस्लिम एकता पार्टी’ बनाई थी। ‘क़ौमी एकता दल’ के टिकट पर चुनाव लड़कर मुख़्तार अंसारी ने बसपा के भीम राजभर को 15994 वोटों से हराया। 2017 विधानसभा चुनाव से पहले मुख़्तार अंसारी ने बसपा जॉइन कर ली।

बसपा के टिकट पर वो चुनावी मैदान में फिर उतरे और एक बार फिर उन्होंने चुनाव जीत लिया। उन्होंने सुभासपा के महेंद्र राजभर को 8698 वोटों से हराया। मुख़्तार को 96793 वोट मिले, सुभासपा के महेंद्र राजभर को 88095 और तीसरे स्थान पर रहे सपा के अल्ताफ़ अंसारी को 72016 वोट मिले।इस बार के विधानसभा चुनाव में मुख़्तार अंसारी का परिवार सुभासपा में शामिल हो गया है।

मऊ सदर सीट से इस बार मुख़्तार अंसारी की जगह उनके बेटे अब्बास अंसारी को टिकट दिया गया है। ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा इस बार सपा के साथ गठबंधन में है। भाजपा की ओर से अशोक सिंह चुनावी मैदान में होंगे , बसपा ने भीम राजभर को टिकट दिया है जबकि कांग्रेस की ओर से मधवेन्द्र सिंह ने नामांकन भरा है।