सुप्रीम कोर्ट में हिजाब मामले में मुस्लिम वकील ने ये क्या कह दिया, इस्लाम के अरकान को लेकर…..

September 9, 2022 by No Comments

कर्नाटक के स्कूलो में हिजाब पर पाबंदी का मामला खत्म होने का नाम नही ले रहा है,और यह मामला कर्नाटक हाईकोर्ट से होते हुवे अब देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने पहुंच चुका है जहाँ लगातार सुनवाई चल रही है,इसी बीच शुक्रवार को इस केस की सुनवाई के समय जज द्वारा की गई टिप्पणी पर भी विवाद खड़ा हो गया है।

जहाँ जज ने बहस के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील से सवाल कर दिया कि इस्लाम में जब नमाज़ ज़रूरी नही तो फिर हिजाब कैसे ज़रूरी हो गया? गौर तलब रहे कि जस्टिस सुधांशु धुलिया की बेंच ने सुनवाई के दौरान फातिमा बुशरा नामक याचिककर्ता के वकील निज़ामुद्दीन पाशा से यह सवाल किया।

ज्ञात रहे कि इस से पहले ही पाशा अदालत को यह समझा रहे थे कि इस्‍लाम में अपने अनुयायियों के पांच मूल सिद्धांतों का पालन कराने की जबर्दस्‍ती नहीं करती, पाशा ने कहा कि इन सिद्धांतों का उल्‍लंघन करने पर कोई सजा नहीं मिलती, पाशा ने दलीलें पेश करते हुए कहा कि ‘सिद्धांतों का पालन करने की बाध्यता नहीं है, इसका मतलब यह नहीं है कि ये इस्लाम में जरूरी नहीं हैं।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक में बाध्‍यता की अनुपस्थिति को गलत समझा, जिसका अर्थ इस्लाम के अनुयायियों को अन्य धर्मों के अनुयायियों को जबरन धर्मांतरित करने से रोकना था, यह फैसला करने के लिए कि हिजाब इस्लाम में एक जरूरी प्रथा नहीं है और इसलिए इसे शैक्षणिक संस्थानों में बैन किया जा सकता है।

हालाँकि वकील पाशा की यह दलील बेहद कमज़ोर रही क्युंकि इस्लाम अपने 5 मूल सिद्धांतो को मानने के लिये अपने अनुयाइयों को मजबूर करता है और इन 5 में से किसी एक को न मानने वाले को इस्लाम से खारिज माना जाता है,अर्थात इस्लाम उसे मुस्लिम ही नही मानता, पाशा ने कहा कि पैगंबर ने कहा था कि महिला के लिए पर्दा दुनिया और उसकी सारी चीजों से भी ज्‍यादा जरूरी है।

उन्‍होंने पूछा, ‘जब कुरान कहती है कि पैगंबर की बात सुनो और एक मुस्लिम लड़की को बाहर निकलते वक्‍त हिजाब पहनने में भरोसा है तो क्‍या सरकार, जिसके लिए धार्मिक आधार पर शिक्षण संस्‍थानों में भर्ती के लिए भेदभाव नहीं करना अनिवार्य है, उसकी एंट्री रोक सकती है।

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