नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी की ख़बर से उत्साहित हो गए बसपा कार्यकर्ता लेकिन अब जो ख़बर आयी उससे तो…

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की बुरी हार हुई. एक समय ये पार्टी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर क़ाबिज़ हुआ करती थी और जब चुनाव न जीत पाती थी तो दूसरे स्थान पर रहा करती थी. सीटों के मामले में बसपा राज्य की नौवें नम्बर की पार्टी बन गई है, चुनाव में बसपा को महज़ एक सीट हासिल हुई. वोट प्रतिशत में बसपा अभी भी तीसरे नम्बर की पार्टी बनी हुई है.

बसपा को इस विधानसभा चुनाव में 12.88 प्रतिशत वोट मिले, ये पिछले चुनाव की तुलना में 9 प्रतिशत से भी अधिक की गिरावट है. 2007 में जब बहुजन समाज पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी तब पार्टी को 30% से अधिक वोट मिला था और 2012 में सपा लहर के बाद भी बसपा क़रीब 26 प्रतिशत वोट पायी थी. 2017 में पार्टी का वोट प्रतिशत गिरा और ये 22% के क़रीब रह गया.

2017 में फिर भी ये ग़नीमत थी कि बसपा को सपा से अधिक वोट मिले थे, सपा को 22 प्रतिशत से कुछ कम वोट मिला था जबकि बसपा को 22 प्रतिशत से कुछ अधिक वोट मिला था. हालाँकि तब सपा 311 सीटों पर ही चुनाव लड़ी थी और बसपा ने सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ा था. बसपा के इस चुनाव में ख़राब प्रदर्शन करने की कई वजहें हैं.

एक तो इसका कोर वोट भाजपा में शिफ्ट कर गया और पार्टी ने उसे अपने पाले में वापिस लाने के लिए वो संघर्ष नहीं किया जो करना चाहिए. पार्टी को उम्मीद थी कि उसे ब्राह्मण वोट मिलेंगे लेकिन ऐसा भी नहीं हो सका. पार्टी में मज़बूत पकड़ रखने वाले सतीश चन्द्र मिश्रा को पॉपुलर नेता नहीं माना जाता, ऐसे में उनके चेहरे पर बसपा प्रमुख मायावती ये उम्मीद करें कि उनके समाज के वोट मिलेंगे तो ये समझ से परे चीज़ है.

बसपा प्रमुख को उम्मीद मुस्लिम समाज से भी थी. बसपा ने बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिए लेकिन न तो कोई मुस्लिम नेता चुनाव ही जीता और न ही पार्टी को मुस्लिम वोट ही मिला. इसका भी कारण यही है कि समाज का कोई बड़ा नेता पार्टी में नहीं है. एक समय नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी बसपा में थे और पार्टी का मुस्लिम चेहरा माने जाते थे. परन्तु ये भी एक सच है कि नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी भी कभी पॉपुलर नेता नहीं रहे.

हालाँकि मिश्रा और सिद्दीक़ी दोनों संगठन के अन्दर काम करने में माहिर माने जाते हैं. बसपा के अन्दर से ये आवाज़ें उठ रही हैं कि अगर पार्टी को फिर से खड़ा करना है तो उसे दलितों के अलावा दूसरे समुदायों में भी अपनी पकड़ बनानी होगी. ऐसे में सतीश चन्द्र मिश्रा और नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी दोनों काम आ सकते हैं.

इसमें भी दो मुश्किलें हैं, एक तो ये कि बसपा के अन्दर माँग उठ रही है कि अब पार्टी अपने पुराने नारे ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ पर काम करे और बजाय बाक़ी समुदायों को जोड़ने के दलित समुदायों को पहले अपने पक्ष में करे. वहीं दूसरी मुश्किल ये है कि सतीश चन्द्र मिश्रा तो पार्टी में मज़बूती से काम कर रहे हैं लेकिन नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी कुछ साल पहले कांग्रेस के साथ जा चुके हैं.

बसपा अपनी स्थिति सुधारने के लिए अपने पुराने नेताओं को पार्टी में लाना चाहती है. ऐसे में ख़बरें आयीं कि नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम सकते हैं. नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी के बसपा में शामिल होने की ख़बर आते ही बसपा कार्यकर्ताओं में उत्साह दिखने लगा जबकि कांग्रेस के अन्दर चिंता देखी जाने लगी.

इस सब के बीच नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी ने सोशल मीडिया पर एक बयान जारी कर कहा कि इस तरह की ख़बरें सिवाय अफ़वाह के कुछ नहीं हैं. उन्होंने मीडिया में आयी इस ख़बर को झूठ बताया और कहा कि उनके नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी हैं. आपको बता दें कि जिस तरह से बसपा अपनी स्थिति बेहतर करने में लगी है, बिल्कुल उसी तरह कांग्रेस भी काम कर रही है.

हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में जहां भाजपा ने बहुमत हासिल किया वहीं सपा ने मज़बूत विपक्ष की भूमिका हासिल की. ऐसे में बसपा और कांग्रेस जैसी पार्टियाँ बहुत पिछड़ती दिखीं. भाजपा और सपा के गठबंधन में शामिल छोटी पार्टियों ने भी बसपा और कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन किया.

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