‘नौशेरा का शेर’ ब्रिगेडियर उस्मान, जिन पर पाकिस्तान ने रखा था 50,000 का इनाम

July 4, 2022 by No Comments

ब्रिगेडियर उस्मान का जन्म 15 जुलाई 1912 को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के बीबीपुर गांव में हुआ था। उनके पिता मोहम्मद फारूख बनारस शहर के कोतवाल थे। अपने बेटे को सिविल सेना में भेजने की चाहत रखने वाले फारूख को उस समय मायूसी हाथ लगी जब बेटे उस्मान ने कहा कि वह सेना में जाएगा। चूंकि आजादी से पहले का समय था तो उन्होंने रॉयल मिलिट्री अकादमी सैंडहर्स्ट के लिए अप्लाई किया और सलेक्शन भी हो गया। उस्मान उन 10 लोगों में एक थे जिनका चयन इसके लिए हुआ था जिनमें सैम मानेकशॉ और मोहम्मद मूसा भी एक थे जो आगे चलकर क्रमश: भारत और पाकिस्तान के आर्मी चीफ बने।

बात उस समय की है जब देश की आजादी को महज कुछ ही महीने हुए थे कि पाकिस्तान ने कबायली घुसपैठियों के जरिए जम्मू कश्मीर में घुसपैठ शुरू कर दी। करीब 5 हजार घुसपैठियों ने घाटी के नौशेरा सेक्टर में आड़ लेकर भारतीय जवानों पर फायरिंग कर दी। अचानक हुई इस फायरिंग के लिए सेना भी तैयार नहीं थी जिस वजह से उसे शुरूआत में नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन ब्रिगेडियर उस्मान नाम के एक भारतीय ऑफिसर के नेतृत्व में सेना ने कबायलियों को इस कदर धूल चटाई की करीब एक हजार कबायली घुसपैठिये मारे गए जबकि इतनी ही बड़ी संख्या में घायल भी हो गए। हालांकि भारत के 22 जवान भी शहीद हो गए। ब्रिगेडियर उस्मान के नेतृत्व में फौज ने पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया कि वह उसे कभी भूल नहीं पाया।

भारत के कई सैन्य इतिहासकारों की राय है कि अगर ब्रिगेडियर उस्मान की समय से पहले मौत न हो गई होती तो वो शायद भारत के पहले मुस्लिम थल सेनाध्यक्ष होते. एक कहावत है कि ईश्वर जिसे चाहता है उसे जल्दी अपने पास बुला लेता है. बहादुरों की बहुत कम लंबी आयु होती है. ब्रिगेडियर उस्मान के साथ भी ऐसा ही था. जब उन्होंने अपने देश के लिए अपनी जान दी तो उनके 36वें जन्मदिन में 12 दिन बाकी थे. लेकिन अपने छोटे से जीवनकाल में उन्होंने वो सब हासिल कर लिया जिसको बहुत से लोग उनसे दोहरा जी कर भी नहीं पा पाते हैं.वो शायद अकेले भारतीय सैनिक थे जिनके सिर पर पाकिस्तान ने 50,000 रुपए का ईनाम रखा था जो उस ज़माने में बहुत बड़ी रक़म हुआ करती थी. 1948 में नौशेरा का लड़ाई के बाद उन्हें ‘नौशेरा का शेर’ कहा जाने लगा था.

ब्रिगेडियर उस्मान 3 जुलाई 1948 को पाकिस्तानी घुसपैठियों से ल’ड़ते हुए शहीद हो गए. उस समय बाद में भारत के उप-थलसेनाध्यक्ष बने जनरल एस के सिन्हा मौजूद थे.ब्रिगेडियर उस्मान के मरते ही पूरी गैरिसन में शोक छा गया. जब भारतीय सैनिकों ने सड़क पर खड़े हो कर अपने ब्रिगेडियर को अंतिम विदाई दी तो सब की आँखों में आँसू थे. उनके जनाज़े को जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में दफ़नाया गया जिसमें भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ मौजूद थे. इसके तुरंत बाद ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को मरणोपराँत महावीर चक्र देने की घोषणा कर दी गई.

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