बिहार में एक बार फिर नीतीश कुमार सत्ता पर क़ाबिज़ हो गए हैं. हालाँकि इस बार उनकी स्थिति पहले से काफ़ी कमज़ोर है. अब वो भाजपा के भरोसे हैं लेकिन नीतीश कुमार कहीं और एक उम्मीद देख रहे हैं. असल में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने बिहार में सीटें कम जीती हैं लेकिन लोकसभा में जदयू की 16 सीटें हैं और भाजपा के बाद NDA में सबसे अधिक उसी की सीटें हैं और अगर इस लिस्ट में से लोजपा का नाम हटा दें तो फिर कोई और पार्टी ऐसी है ही नहीं जिसके पास 3 सीटें हों.

बहुत उम्मीद है कि लोजपा जल्द ही NDA गठबंधन से बाहर आ सकती है. ऐसा होता है तो जदयू की स्थिति थोड़ी ठीक हो जायेगी. NDA की कुल 334 सीटें हैं जिनमें से 302 भाजपा की अकेले की हैं. इसके बाद जदयू की 16, लोजपा की 6, अपना दल (सोनेलाल) की 2 और कई दलों की एक-एक सीट है. ध्यान देने वाली बात ये भी है कि जदयू को छोड़कर NDA के साथ कोई भी ऐसा दल नहीं रह गया है जिसकी किसी भी राज्य में पूरी पकड़ हो. लोजपा बिहार के एक क्षेत्र तक सीमित है, अपना दल (सोनेलाल) उत्तर प्रदेश के बहुत छोटे से हिस्से में प्रभावी है.

ऐसे में NDA के लिए जदयू को साथ ज़रूरी सा लगता है. भाजपा के साथ एक समय शिव सेना और अकाली दल जैसे बड़े दल थे लेकिन अब ये अलग-अलग वजहों से गठबंधन छोड़ चुके हैं. अभी इस बारे में अधिक सवाल उठने शुरू नहीं हुए हैं लेकिन जदयू अगर NDA से अलग हो जाए तो ऐसे सवाल सामने होंगे कि क्या भाजपा की नई लीडरशिप गठबंधन राजनीति करने में अक्षम है. नीतीश कुमार इस बात को भलीभांति समझते हैं और यही वजह है कि मुख्यमंत्री के पद पर एक बार फिर क़ाबिज़ हो गए हैं.

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