बिहार की राजनीति में इन दिनों हलचल है. इसकी वजह है कि जदयू और भाजपा में साफ़ तौर पर दूरी दिख रही है और जदयू और राजद में एक बार फिर नज़दीकी दिख रही है. ऐसा लग रहा है कि नीतीश कुमार एक बार फिर समाजवादी ख़ेमे में जाना चाहते हैं. इसकी अटकलें तब और तेज़ हो गईं जब नीतीश कुमार राजद द्वारा आयोजित की गई इफ्तार पार्टी में शामिल हुए.

नीतीश कुमार इस इफ्तार पार्टी में शामिल तो हुए ही लेकिन जिस अंदाज़ में वो लालू परिवार से मिले और जिस अंदाज़ में लालू परिवार उनसे मिला, उससे ऐसा लगा कि कुछ तो सियासी खिचड़ी पक रही है. बोचहाँ विधानसभा उपचुनाव की हार से अब तक परेशान भाजपा को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ये स्टैंड उलझा रहा है.

जहाँ नीतीश इस मुलाक़ात को ग़ैर-सियासी बता रहे हैं वहीं राजद नेता तेज प्रताप यादव ने साफ़ कर दिया है कि वो बिहार में सरकार बना रहे हैं. तेज प्रताप यादव से जब ये सवाल किया गया कि इफ़्तार पार्टी के क्या कोई राजनीति मायने भी हैं तो उन्होंने कहा कि बिहार में खेल होगा. लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप ने कहा कि राजनीति में उथल-पुथल होती रहती है।

उन्होंने कहा कि मैंने तो पहले ही तेजस्वी को अर्जुन घोषित कर दिया है। बिहार में हम सरकार बनाएंगे। वो आगे कहते हैं कि पहले हमने नो एंट्री का बोर्ड लगाया था लेकिन रामनवमी पर मैंने अपने ट्वीट में एंट्री नीतीश चाचा लिखा और आज वो यहां आए। तेजप्रताप ने दावा करते हुए कहा है कि आज नीतीश कुमार के साथ सियासी बातचीत हुई है।

आपको बता दें कि इफ़्तार पार्टी तो हर साल आयोजित की जाती है लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पाँच साल बाद लालू परिवार की ओर से दी गई इफ़्तार पार्टी में शामिल हुए हैं. इसके पहले वो 2017 में उनके घर आए थे. 2017 में ही नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग हो गए और भाजपा से जा मिले. इसके बाद नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के बीच विधानसभा में कई बार नोक-झोंक भी देखी गई.

जदयू और भाजपा में क्यूँ बढ़ रही हैं दूरियाँ?

असल में बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं लेकिन उनकी पार्टी की सीटें भाजपा की सीटों से काफ़ी कम हैं. बिहार विधानसभा में नीतीश की जदयू की 45 सीटें हैं जबकि भाजपा की सीटें 77 हैं. इस वजह से भाजपा नेता माँग करते रहे हैं कि मुख्यमंत्री उनकी पार्टी का हो लेकिन समस्या ये है कि 243 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत 122 सीटों पर होता है और NDA के सभी दलों की कुल सीटें 127 हैं, अब अगर इसमें से जीतन राम माँझी की हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा निकल जाए तो ये सीटें 123 ही बचेंगी, NDA को एक निर्दलीय का भी समर्थन है तो अगर वो भी पलट जाए तो 122 सीटें ही हैं.

नीतीश कुमार की पार्टी की सीटें 45 हैं लेकिन अगर नीतीश इस गठबंधन को छोड़ दें तो सरकार गिर जाएगी और 45 सीटें भाजपा कहीं और से तोड़कर ले आए ऐसा तो लगता नहीं. दूसरी ओर राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन की सीटें 92 हैं जिसमें अकेले राजद की 76 सीटें हैं, बाक़ी सीटें सीपीआई-एमएल, सीपीआई, और सीपीआई-एम की हैं.

अगर इस महागठबंधन में कांग्रेस भी आ जाए तो ये आँकड़ा बढ़कर 111 हो जाएगा वहीं AIMIM के पाँच विधायक भी तेजस्वी के ख़ेमे में आ जाएँ तो इस समय इस पूरे गठबंधन की 116 सीटें हो जाएँगी. असल में विवाद इसी बात को लेकर है कि भाजपा नेता चाहते हैं कि अब नीतीश कुमार सत्ता छोड़ दें लेकिन जदयू मानती है कि चुनाव में वोट भले भाजपा को मिल गया हो लेकिन नाम नीतीश कुमार का ही था.

दूसरी ओर कांग्रेस प्रशांत किशोर को अपने ख़ेमे में ला रही है और प्रशांत कोशिश में हैं कि बिहार में नीतीश को कांग्रेस और राजद के क़रीब ले आएँ. इन्हीं सब अटकलों पर ज़ोर देते हुए बिहार कांग्रेस के विधायक शकील ख़ान ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी नज़दीकियां हैं. इसीलिए हमें उम्मीद है कि बहुत जल्द नीतीश कुमार और कांग्रेस के साथ-साथ धर्मनिरपेक्ष पार्टियां एक साथ आ सकती हैं.

शकील ने इसके आगे कहा कि प्रशांत किशोर के पास अनुभव के साथ-साथ डाटाबेस भी है. प्रशांत किशोर पहले JDU में रह भी चुके हैं. इस वजह से उन्हें अच्छे से पता है कि अगर नीतीश कुमार कांग्रेस के साथ आते हैं तो NDA के लिए यह बड़ा झटका हो सकता है.

शकील ख़ान कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि देर-सवेर प्रशांत किशोर नीतीश को कांग्रेस के नज़दीक ले आएँगे।शकील कहते हैं कि कांग्रेस पहले भी कहती आई है कि नीतीश कुमार और भाजपा में संबंध अब पहले जैसा नहीं रह गया है. भाजपा नीतीश कुमार को कमजोर करना चाहती है और यह बात नीतीश कुमार भी समझ रहे हैं. कांग्रेस चाहती है कि नीतीश कुमार जैसे सहयोगी अगर कांग्रेस के साथ आ जाएं तो आने वाले लोकसभा चुनाव में NDA को हराया जा सकता है.

असल में एक तरफ़ जहाँ ऐसी ख़बरें हैं कि प्रशांत किशोर कांग्रेस में जाने का पूरा मन बना चुके हैं वहीं नीतीश से भी वो हाल के दिनों में मिले हैं। यही वजह है कि अटकलें तेज़ चल रही हैं। वहीं जदयू नेता नीतीश-प्रशांत की मुलाक़ात पर कह रहे हैं कि ये एक व्यक्तिगत मुलाक़ात थी। परंतु ये भी सच है कि राजनीति में कुछ भी व्यक्तिगत नहीं होता।

एक कारण इन अटकलों का ये भी है कि जदयू और भाजपा के संबंध इस समय अच्छे नहीं हैं। जदयू की सीटें भाजपा से कम हैं लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। बिहार भाजपा के नेता बार बार ये कहते रहे हैं कि मुख्यमंत्री भाजपा का बनाया जाए। परंतु भाजपा अगर ऐसा कुछ भी करने की कोशिश करेगी तो नीतीश राजद के साथ जा सकते हैं।

कुल मिलाकर गणित ऐसी फँसी है कि जदयू कमज़ोर होने के बाद भी सत्ता में है और अपने हिसाब से फ़ैसले ले सकती है। जदयू कांग्रेस के नज़दीक जाएगी या नहीं ये तो वक़्त बताएगा लेकिन शकील ख़ान के बयान ने सियासी हलचल तो बढ़ा ही दी है।