हाल ही में महाराष्ट्र में “मेन्स्ट्रू’अल हाइ’जीन डे” मनाया गया जिसके लिए एक गीत बनाया गया था। ये गीत लोगों ने इतना पसंद किया कि इसे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने ख़ुद अपने सोशल मीडिया अकाउंट से शेय’र भी किया था। इस गीत को संगीत से सजाया रमीज़ रज़ा ने, जिनसे हमने बात की और ये जानने की कोशिश की कि आख़ि’र इस गीत के लिए संगीत बनाते समय उन्हें किस तरह के ख़यालों से रूबरू होना पड़ा साथ ही हमने उनसे और भी कई ज़रूरी मु’द्दों पर बात की..पढ़िए रमीज़ रज़ा से हुई ये दिलचस्प बातचीत और जानिए देश के ऐसे ऐसे युवा के बारे में जो जा’गरूकता लाने में आगे आते हैं

1- आप इस गीत से किस तरह जुड़े और अब जब एक अलग ही स्तर पर इस गीत को पहचान मिली है तो आपको कैसा लगता है? रमीज़- सबसे पहले मैं अ’ल्लाह ता’ला का शु’क्र अदा करता हूँ। इस गीत से मैं जो जुड़ा हूँ वो हमारे शहर के मेरे अज़ीज़ दोस्त लक्ष्मण भवाने और साँची गजघाटे की वजह से। इनका NGO है, आहना इनोवेशन एंड सोशल वेनचर्स नाम से। इस NGO के द्वारा ये सोशलवर्क करते हैं। इनका एक इवेंट था मेन्स्ट्रू’अल हाइजी’न डे, जो कि 28 मार्च को सेलब्रेट होता है। इस इवेंट के लिए इन्हें एक सॉंग चाहिए था। ऐसे टॉपिक पर मैंने पहले कभी काम नहीं किया था यह मेरे लिए बहुत चैलें’जिंग था और जबकि मुझे म्यूज़िक डायरेक्टर बनना है तो हर तरीक़े का चैलें’ज और सब्जेक्ट ऐक्सेप्ट करके उस पर वर्क करना ज़रूरी है। मैंने चैलें’ज ऐक्सेप्ट किया और अ’ल्लाह का नाम लेकर कम शुरू किया। अ’ल्लाह के करम से और माता-पिता की दुआओं से ये गीत सारे हिंदुस्तान में जा पहुँचा है। बहुत सी जगह से इंटर्व्यू के लिए कॉल आ रहे हैं म्यूज़िक वर्क के लिए कॉल आ रहे हैं और इस कामयाबी के लिए ख़ुशी के लिए अल्ला’ह का शुक्र अदा करता हूँ।

Tariq Faiz, Rameez Raza with Friend

2- आपने इससे पहले और कौन से गीत कंपोंज़ किए हैं? रमीज़- -इससे पहले मैंने कुछ सूफ़ी क़व्वाली, रोमांटिक, सैड वग़ैरह सोंग कम्पोज़ किया है एक मराठी फ़िल्म थी जिसका लास्ट इयर दिया था। अभी एक मराठी मूवी में फिर से जो मैं कर रहा हूँ इंशाल्लाह बहुत जल्द वो रिलीज़ हो रही है। शॉर्ट फ़िल्म है जिसका बैकग्राउंड म्यूज़िक मैंने किया है, 2 सेमी क्लासिकल गीत हैं जो लॉंच होंगे। स्कूल के बच्चों का एक गीत है मैंने लिखा और कम्पोज़ किया है वो भी मेरे यूट्यूब चैनल CANDID MUSIC STUDIO से लॉंच होगा आने वाले कुछ ही दिनों में। इस गीत में भी मैं बच्चों की तरफ़ से अपने स्कूल के लिए जो फ़ीलिंग होती है वो सारी मैंने देने की कोशिश की है, काफ़ी इंट्रेस्टिंग लिरिक्स और म्यूज़िक है इसका। इं’शाल्लाह हिंदुस्तान में सभी को पसंद आएगा।

3- क्या आपको लगता है कि कोई भी संदेश संगीत के ज़रिए ज़्यादा लोगों तक पहुँचता है? रमीज़- जी हाँ, मुझे ऐसा लगता है कि संगीत के ज़रिए हम कोई भी मैसेज आ’वाम तक बहुत आसानी से और जल्द पहुँचा सकते हैं। 4- आप संगीत के क्षेत्र में ही काम करना चाहते हैं या गीत के लेखक ता’रिक़ फ़ै’ज़ की तरह आप भी अलग करियर की ओर बढ़ चुके हैं? रमीज़– जी हाँ मैं संगीत के क्षेत्र में ही काम करना चाहता हूँ और इंशाल्ला’ह करता रहूँगा, रही मेरे भाई ता’रिक़ फ़ै’ज़ की बात तो ऐसी शख़्सियत हज़ारों में एक होती है, सदियों में एक आती है जो इतने काम करती है और अ’ल्लाह उनको नवाज़ता भी है।

5- आपको अगर सामाजिक जागरूकता के लिए संगीत का ऑफ़र और एक फ़िल्म में म्यूज़िक का ऑफ़र मिले जिन्हें आपको एक ही दिन में देना हो तो आप किसे चुनेंगे? रमीज़– मैं जिस माहौल में पला बढ़ा हूँ वहाँ पर तो सारी चीज़ें सोशल वर्क में ही मैंने देखी है। मेरे पिताजी शे ख़ गुरुजी जो कि विदर्भ के बहुत बड़े नाम हैं, उन्होंने ने भी ज़िंदगी भर अपने संगीत के ज़रिए सोशल वर्क किया है। हज़ारों स्टूडेंट्स बनाए हैं भजन के माध्यम से, क़व्वाली के माध्यम से और सारा फ़ोकस जो रहा है सोशल वर्क पर रहा है तो मेरे लिए तो सोशल वर्क फ़र्स्ट प्रेफ़्रेस रहेगा। मैं इसको ज़्यादा तवज्जो दूँगा तो मेरे माता-पिता को ज़्यादा ख़ुशी महसूस होगी। सोशल मैसेज किसी भी ज़रिए जाता है तो मेरे लिए बड़ी ख़ुशक़िस्मती की बात होगी, चाहे वो फ़िल्म के ज़रिए जाए या फिर किसी भी माध्यम से जाएँ।

6- एक युवा का समाज के लिए क्या योगदान होना चाहिए आपको क्या लगता है?रमीज़– हमारे देश में युवाओं की संख्या दुनिया के किसी भी देश के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा हैं ये बड़ी ख़ुशी की बात है। देश के युवा किसी भी क्षेत्र में हों वो अपने क्षेत्र के ज़रिए अपने काम के ज़रिए देश को मज़बूत करने और आगे ले जाने में अपना योगदान दें ऐसा मुझे लगता है। 7- कभी ऐसा हुआ है कि पढ़ाई और संगीत के बीच आपको किसी एक को चुनना पड़ा हो और अगर ऐसा हुआ है तो उस समय आपके माता-पिता की ओर से किस तरह का व्यवहार मिला?रमीज़– ऐसा हुआ है कि मुझे पढ़ाई और संगीत में से किसी एक को चुनना था तो मैंने संगीत को ही चुना था क्योंकि मैं बचपन में ही संगीत को चुन लिया था। जब मैं 10वीं पास हुआ तो मेरे माता-पिता चाहते थे कि मैं पॉलीटेकनिक करके इंजीनियर बनूँ तो मैं वो नहीं किया उसमें मुझे रुचि नहीं थी। फिर मैंने आर्ट्स से पढ़ाई की 12वीं पास हुआ तो फिर वो चाहते थे कि मैं B एड करूँ और टीचर बनूँ। मैंने वो भी नहीं किया तो मम्मी-पापा बहुत नारा’ज़ हो गए और वो सोचने लगे कि मैं ज़िंदगी में क्या करूँगा? उनका कहना था कि संगीत में बहुत मेहनत है, स्ट्र’गल है, पे’शेंस चाहिए। वो मेरी सिक्योर लाइफ़ चाहते थे। उनकी जगह वो सही थे पर मैंने सारा मेरा एजुकेशन म्यूज़िक से ही किया, मेरी डिग्री, मेरे पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री, सारा म्यूज़िक से ही किया है। अब जबकि इस गाने के ज़रिए बहुत नाम हो रहा है और काम मिल रहा है तो माता-पिता बहुत ख़ुश हैं और मेरे फ़्यूचर को लेकर अब उन्हें चिंता नहीं हैं।

8- क्या आपको लगता है कि म्यूज़िक कंपोज़र को इन दिनों भी एक सिंगर से कम पहचान मिलती है?रमीज़– मुझे ऐसा लगता है कि ऐसा कुछ नहीं है कि सिंगर के मुक़ा’बले म्यूज़िक कम्पोज़र को कम पहचान मिलती है। हर आर्टिस्ट अपनी मेहनत से अपना नाम बनाता है चाहे वो सिंगर हो या कम्पोज़र हो या लिरिक्स राइटर हो। पहचान तो ये ऑडीयन्स देती है।9- आपको अपने संगीत की कौन सी बात सबसे अच्छी लगती है और कौन सी ऐसी बात है जो आप बदलना चाहते हैं?रमीज़– मुझे अपने संगीत की सबसे अच्छी बात ये लगती है कि वो हमेशा 24 घंटे मेरे साथ रहता है, मुझसे कोई डिमांड नहीं करता है। वो सिर्फ़मेरा वक़्त माँगता है वो जब भी मुझसे मेरा वक़्त माँगता है तो मुझे उसके बदले में कुछ न कुछ तो ज़रूर देता है। रही कुछ बदलने की बता फ़िलहाल तो ऐसा कुछ नहीं है। मैं ख़ुद अभी एक स्टूडेंट हूँ सीख रहा हूँ और इंशाल्लाह आगे भी सिखता रहूँगा।

10- क्या कभी आपको अपने संगीत के लिए किसी से प्रेरणा मिली है? आप संगीत के क्षेत्र में आना गुरु किसे मानते हैं?रमीज़– मेरे संगीत क्षेत्र में प्रेरणा स्थान हैं उस्ताद अ’ल्लाह र’क्ख़ा, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन और उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान, ये मेरे प्रेरणा स्थान हैं संगीत के लिए। वैसे संगीत में मैंने बहुत से लोगों से बहुत कुछ सीखा है और जिनसे मैंने बैठकर ता लीम ली है मेरे पहले उस्ताद मेरे पिताजी शेख़ गुरुजी हैं। उनके बाद मैं मेरे गुरुजी जिनसे मैंने तबले की तालीम ली है पंडित रमेश शुक्ला जी, जो कि उस्ताद अ’ल्लाह र’क्ख़ा साहब के स्टूडेंट्स हैं।

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