समाजवादी पार्टी से लगातार नाराज़ चल रहे शिवपाल यादव को लेकर कल ऐसी ख़बरें आयीं कि वो अपना गठबंधन सपा से तोड़ लेंगे. उनकी पार्टी प्रसपा है और वो चाहते हैं कि सपा में इस पार्टी का विलय हो जाए लेकिन मुश्किल ये है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव इसके लिए तैयार नहीं दिख रहे. इसी सब विवाद में बात इतनी बढ़ गई कि ख़बरें यहाँ तक आने लगीं कि शिवपाल यादव जल्द ही भाजपा के साथ गठबंधन कर सकते हैं.

ख़बरें तो यहाँ तक आयीं कि शिवपाल को भाजपा राज्यसभा भेज सकती है और जसवंतनगर विधानसभा सीट से उनके बेटे आदित्य यादव को विधायक का चुनाव लड़ा सकती है. हालाँकि शिवपाल कैम्प कल के बाद से ही कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा. असल में शिवपाल यादव भाजपा नेताओं से जो भी मुलाक़ात कर रहे हैं वो सपा नेतृत्व पर दबाव बनाने का उनका अपना तरीक़ा है.

शिवपाल यादव यही चाहते हैं कि उन्हें सपा में ही कोई ठीक ठाक पद दे दिया जाए जिसके बाद वो अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा सकें. शिवपाल यादव कैम्प में आज जिस तरह कोई गतिविधि नहीं दिख रही है उससे लगता है कि शिवपाल यादव अब सपा नेतृत्व की ओर से किसी तरह के इशारे का इंतज़ार कर रहे हैं.

शिवपाल चाहते हैं कि मुलायम सिंह यादव दख़ल करें और मामले का हल निकालें. वहीं अखिलेश यादव अपने चाचा शिवपाल यादव पर किसी प्रकार का भरोसा नहीं कर पा रहे हैं. अखिलेश के क़रीबी लोगों में अब उन लोगों की एहमीयत अधिक हो गई है जिनका ख़ुद कोई राजनीतिक आधार नहीं है. इस चुनाव में सपा को अधिकतम वोट अखिलेश यादव के नाम पर ही मिले.

सपा की अपनी पुरानी लोकप्रियता और अखिलेश यादव का नाम पूरे चुनाव में छाया रहा. सुनील सिंह साजन, उदयवीर सिंह, नरेश उत्तम पटेल जैसे नेता जो आज पार्टी के सर्वेसर्वा बने हुए हैं, इनकी अपनी कोई लोकप्रियता नहीं है. सपा के कई पदाधिकारी अपना बूथ भी पार्टी को नहीं जिता सके हैं. सपा में अखिलेश यादव के बाद आज़म ख़ान ही ऐसे नेता हैं जिनकी पॉपुलैरिटी बहुत है लेकिन वो भी संगठन की चीज़ों से अब दूर हो चुके हैं.

अधिकतर मामलों में उस नई खेप की ही चलती है जो अखिलेश के पार्टी संभालने के बाद मज़बूत हुई है. विश्लेषक मानते हैं कि सपा की ओर से कम से कम 50 सीटों पर ग़लत टिकट वितरण हुआ और इसका कारण यही नेता हैं जिनका ख़ुद जनाधार नहीं है. चूंकि ख़ुद जनाधार नहीं है इसलिए वो ज़मीनी सच्चाई से रू-ब-रू नहीं रहते.

ऐसा माना जाता है कि ख़ुद अखिलेश तो शिवपाल को बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं देना चाहते लेकिन अखिलेश के साथ जो लोग हैं वो भी यही चाहते हैं कि शिवपाल न आने पाएँ. इन लोगों को डर है कि अगर शिवपाल पार्टी में मज़बूत होंगे तो ये सभी लोग कमज़ोर हो जाएँगे. शिवपाल ने प्रसपा बना ली और दो बार इस पार्टी के रहते विधानसभा चुनाव भी हुआ.

परन्तु शिवपाल सपा के ही टिकट पर चुनाव लड़े. इसका अर्थ यही है कि शिवपाल सपा में ही रहना चाहते हैं और इसमें कोई पद चाहते हैं. शिवपाल ने हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर ऐसे संकेत तो दिए थे कि वो भाजपा में जा सकते हैं लेकिन ये सपा को डराने वाला ही क़दम नज़र आता है. शिवपाल यादव अब इंतज़ार में हैं कि अखिलेश यादव उनसे बात करें और कुछ उनकी एहमीयत समझें. दूसरी ओर सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर इस कोशिश में लगे हैं कि अखिलेश यादव और शिवपाल यादव में सुलह हो जाए.