2012-17 के बीच उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार थी. इस सरकार के बारे में तब मीडिया में ये बातें आने लगी थीं कि अखिलेश यादव की सरकार में 4 मुख्यमंत्री हैं. मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव, आज़म ख़ान और अखिलेश यादव- ऐसा लगता था कि अखिलेश शुरू के तीन नामों के दबाव में काम कर रहे हैं. अखिलेश ने सरकार पर अपनी पकड़ मज़बूत करने की कोशिश की.

ऐसे में उनके साथ राम गोपाल यादव आ गए और दोनों ने मिलकर ये समझा कि शिवपाल यादव की वजह से सरकार की छवि ख़राब हो रही है. उस समय मुलायम सिंह यादव सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे जबकि शिवपाल यादव उत्तर प्रदेश अध्यक्ष थे. अखिलेश यादव का पार्टी पर कोई विशेष कण्ट्रोल न थे इसलिए कई बार उन्हें दबाव में फ़ैसले लेने पड़ते थे.

अखिलेश यादव ने राम गोपाल यादव के साथ मिलकर तय किया कि वो शिवपाल की ताक़त कम करेंगे. 2016 आते-आते पार्टी में विवाद की ख़बरें मीडिया में आने लगीं. कुछ दिनों में अखिलेश यादव और शिवपाल दोनों पर कटाक्ष करने लगे. शिवपाल ख़ेमे ने आरोप लगाया कि अखिलेश सरकार में अपनी मर्ज़ी कर रहे हैं और किसी की नहीं सुनते.

इस पूरे मामले में आज़म ख़ान ने दोनों में से किसी का पक्ष नहीं लिया और मीडिया में इसे सपा और मुलायम सिंह यादव परिवार का अंदरूनी मामला बताया. अखिलेश यादव मुलायम के बेटे हैं जबकि शिवपाल यादव मुलायम सिंह के भाई हैं. कहा जाता है कि अखिलेश यादव की परवरिश के समय मुलायम तो राजनीति के काम से बिज़ी रहते थे, ऐसे में शिवपाल ने अखिलेश की ख़ूब देखभाल की थी.

अखिलेश यादव के राजनीति में सक्रिय हो जाने के बाद शिवपाल और अखिलेश दोनों में मतभेद नज़र आने लगे. अखिलेश आधुनिक शिक्षा लेकर आए व्यक्ति थे जो राजनीति से उन लोगों को बाहर करना चाहते थे जिनको बाहुबली कहा जाता है वहीं शिवपाल यादव पुराने मिज़ाज के नेता हैं जिनका सोचना है कि राजनीति में सबको साथ लेकर चलना होता है चाहे उसकी व्यक्तिगत आदतों को हम अच्छा न भी मानें.

बेटे और भाई के बीच सियासी लड़ाई में मुलायम सिंह यादव शिवपाल यादव के साथ नज़र आए. एक समय ऐसा भी आया कि मुलायम ने अखिलेश यादव को पार्टी से बाहर कर दिया. शिवपाल यादव के साथ की गई इस प्रेस वार्ता में मुलायम ने राम गोपाल यादव को भी पार्टी से बाहर करने का एलान किया था. हालाँकि राजनीतिक समीकरण तेज़ी से बदले और 1 जनवरी 2017 को अखिलेश यादव और राम गोपाल यादव की ओर से सपा के नाम पर अधिवेशन किया गया.

इस अधिवेशन में एलान किया गया कि अब सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं, वहीं शिवपाल यादव को पार्टी से बाहर कर दिया गया और मुलायाम सिंह यादव को सपा का संरक्षक बना दिया गया. चुनाव आयोग ने भी अखिलेश यादव के दावे को सही माना और सपा के कर्ता-धर्ता अखिलेश यादव हो गए. इसके बाद से ही शिवपाल यादव अपनी राजनीतिक स्थिति को बेहतर करने के लिए संघर्षरत हैं.

शिवपाल ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बनाई लेकिन चाहे 2017 हो या 2022 दोनों बार वो चुनाव सपा के ही सिम्बल पर लड़े. प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का संगठन यूँ तो आज भी सक्रिय है और कई बड़े नेता भी इस संगठन में हैं लेकिन कहीं न कहीं शिवपाल सपा में ही बने रहना चाहते हैं और चाहते हैं कि उन्हें वो सम्मान वापिस मिल जाए जिसके वो हक़दार हैं.

2022 विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद ऐसी सम्भावनाएं बनने लगीं कि अखिलेश यादव फिर से शिवपाल को सपा की कोर टीम में शामिल करेंगे. कुछ ख़बरें तो यूँ भी थीं कि शिवपाल को विधानसभा में प्रतिपक्ष का नेता बनाया जाए लेकिन अखिलेश यादव ने उन्हें सपा के विधायकों की मीटिंग में ही नहीं बुलाया. मीडिया ने सवाल किया तो अखिलेश ने कहा कि वो सहयोगी दल के नेता हैं, उन्हें सहयोगी दल की मीटिंग में बुलाया जाएगा.

शिवपाल यादव सपा के विधायकों की मीटिंग में न बुलाये जाने से ख़ासे नाराज़ दिखे. उन्होंने सहयोगी दलों की मीटिंग में जाने से भी इनकार कर दिया. असल में अखिलेश यादव के क़रीबी मानते हैं कि अभी भी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी अपने आप में सक्रिय हैं और शिवपाल इस पार्टी के अध्यक्ष हैं तो आख़िर शिवपाल को सपा का नेता कैसे माना जाए.

वहीं शिवपाल चाहते हैं कि उन्हें अब सपा में ही ज़िम्मेदारी दी जाए. वो अपनी पार्टी का विलय भी सपा में कराना चाहते हैं जिससे उनके कार्यकर्ताओं को भी सम्मान मिल सकेगा. अब इस पूरे विवाद में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर ने बयान दिया है. उन्होंने कहा है कि कोई नाराज़गी नहीं है और अगर कोई नाराज़गी है तो उसे दूर कर लिया जाएगा.

शिवपाल यादव ने इसके पहले कहा था कि मैंने हमेशा कहा है कि मुझे जो भी ज़िम्मेदारी दी जाएगी मैं उसके अनुसार काम करूँगा लेकिन मुझे विधायक दल की बैठक में नहीं बुलाया गया था हालाँकि मैं सपा का विधायक हूँ. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि शिवपाल सपा की राजनीति करने के इच्छुक हैं. वो चाहते हैं कि उनको सपा में पूरी तरह से शामिल कर लिया जाए और वो पार्टी के भीतर पहले जैसा काम कर सकें. शिवपाल ये जानते हैं कि उन्हें सपा उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष या नेता प्रतिपक्ष जैसी पोस्ट नहीं देगी लेकिन वो चाहते हैं कि उन्हें कोई सम्मानित पोस्ट पार्टी की तरफ़ से दी जाए.

राजनीति से जुड़े जानकार मानते हैं कि सपा को ये मामला जल्द सुलझाना चाहिए क्यूँकि इसी तरह के विवादों की वजह से पार्टी के पक्ष में अच्छा माहौल होने के बावजूद चुनाव में सपा की हार हो गई. अगर इन मामलों को न सुलझाया गया तो सपा को लोकसभा चुनाव में भारी नुक़सान उठाना पड़ सकता है. दूसरी ओर इस तरह की ख़बरें भी आ रही हैं कि शिवपाल यादव भाजपा नेता अमित शाह से मिल सकते हैं. मीडिया में आ रही इस तरह की अपुष्ट ख़बरों में अगर सच्चाई है तो सपा के लिए ये एक बड़ी मुश्किल की बात हो सकती है.