सुप्रिम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मारकंडें काटजू ने अलविदा के दिन रोज़ा रखा है। साथ ही उन्होनें सभी को रोज़ा रखने की अपील किया है।जस्टिस काटजू उर्दू के बड़े जानकारो में से है और ये कई बार पूरे महीने के रोज़े भी रख चुके है। रमज़ान के महिने में 30 दिनों तक मुस्लिम समुदाय के लोग रोजा रखते हैं। रोजे में सुबह सुर्योदय से पहले से लेकर शाम में सुर्यास्त तक कुछ भी खाया पिया नहीं जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ-साथ सभी को रमजान के महिने की मुबारकबाद देते हुए कहा, पिछले कई सालों से मैं रमजान के महिने में एक दिन रोजा रखता आ रहा हूं। यह मेरे मुस्लिम भाइयों के प्रति एकजुटता के प्रतीक के तौर पर है।
काटजू ने इस साल भी दूसरे समुदाय के लोगों से रमजान के महिने में एक दिन रोजा रखने की अपील की है।

इसके पीछे के मकसद के बारे में बताते हुए काटजू ने कहा, गैर मुस्लिमों द्वारा एक दिन रोजा रखना असल में सांप्रदायिकता के उस जहर को काटने की औषधियों में से एक है जो पहले अंग्रेजों और बाद में दूसरों द्वारा हमारे शरीर में भर दिया गया। उन्होंने कहा, इस साल मैंने दुनिया भर के गैर मुस्लिमों से रमजान के आखिरी जुमे को रोजा रखने की गुजारिश की है। उन्होंने लोगों से कहा, अपने मुस्लिम साथियों से सेहरी और इफ्तार का वक्त पता करें और पूरी तन्मयता से रोजा रखें। जस्टिस काटजू ने कहा, वह सभी गैर हिंदुओं से भी नवरात्र के दौरान उपवास रखने की अपील करते हैं।


रमजान में मुस्लिम समुदाय के लोग ही रोजा रखते हैं। पर भारत में कई ऐसे गैर मुस्लिम भी हैं जो इस महिने के दौरान रोजा रखते हैं। उनका मानना है कि इससे उनको एक आध्यात्मिक शांति मिलती है और भूख और प्यास का महत्व भी पता चलता है। भारत की परंपरा ही साझी संस्कृति रही है। सालों से सभी समुदाय एक दूसरे के साथ मिल-जुलकर सभी त्योहार मनाते आए हैं। रमजान में देश के कई हिस्सों में हिंदू समुदाय के लोग मुसलमानों के लिए सेहरी और इफ्तार का प्रबंध कर भाईचारे की मिसाल पेश करते रहे हैं। बिहार के कई इलाकों में हर साल छठ पर्व के दौरान श्रद्धालुओं के लिए घाट जाने वाले रास्तों की सफाई कर मुस्लिम समुदाय के लोग भी अपनी तरफ से इस भाईचारे की भावना को मजबूत करते रहे हैं। जस्टिस काटजू जैसे लोगों की अपील एक स्वागतयोग्य अपील है।

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